जबलपुर:शराब, गाली और पत्थर!तालाब किनारे ‘अंधे क़त्ल’ के क़ातिल का क़रारनामा!
जबलपुर:शराब, गाली और पत्थर!तालाब किनारे ‘अंधे क़त्ल’ के क़ातिल का क़रारनामा!
Anam Ibrahim I
nvestigative Crime Reporter
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जबलपुर:तालाब किनारे टूटी खोपड़ी, खून में भीगा सन्नाटा,रात शराब और गालियों की गूंज थी उसकी तो सुबह ये लाश किसने बिछाई?
*पनागर की अँधेरी रात में दो आदमी बैठे थे, बोतल घूम रही थी,धीरेधीरे लफ़्ज़ ज़हर बन रहे थे फिर अचानक सुबह पत्थरों पर पड़ी लाश पूछ रही थी: मर गया हूं या मार दिया गया हूं? गर क़त्ल निशानदेही हो जिश्म पर मैरे तो फिर क़ातिल कौन??*
*BBC_OF_INDIA*
JABLPUR/MP:
जबलपुर के पनागर में रपटा तालाब के पास की वह क़त्ल की रात अब तक एक सवालिया पहेली बनकर जहन में तैर रही है। दरअसल खेतों की रखवाली करने वाला साठ बरस का हल्लू कोल रात तक तो जिंदा था थका हुआ, मगर जिंदा। किसी झोपड़ी में बैठकर शराब पी गई, कुछ कड़वे शब्द हवा में फेंके गए, और फिर अंधेरे ने सब निगल लिया। सुबह जब गांव की आँख खुली, तो पत्थरों के बीच उसका सिर फूटा पड़ा था।
और सन्नाटा जैसे खुद पूछ रहा था *यह हादसा था.... या किसी गुस्से का खामोश क़त्ल?*
जी हां 3 मार्च की सुबह पनागर थाना ईलाके मे आने वाले ककरहाई रपटा तालाब के पास खेतों की रखवाली करने वाले बुज़ुर्ग *हल्लू कोल (60)* मृत अवस्था में बिना रूह के मरे हुए पाए गए।
सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची। पत्थरों के बीच पड़ा शरीर, सिर पर गहरी चोटें और आसपास फैला सन्नाटा सब कुछ बता रहा था कि रात यहाँ सिर्फ़ नींद नहीं सोई थी, *हिंसा भी जागी थी*।
मृतक की बेटी *भूरी कोल* ने बताया कि उसके पिता पिछले दो वर्षों से खेतों की रखवाली करते हुए तालाब किनारे बनी झोपड़ी में रहते थे।
सुबह गांव के एक व्यक्ति ने फोन कर खबर दी कि हल्लू कोल मृत पड़े हैं।
शुरू में मामला किसी हादसे का आभास देता था।
मगर जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई, तो सच्चाई ने अपनी ठंडी उँगली से इशारा किया
*यह मौत नहीं, हत्या थी।*
पुलिस ने अज्ञात आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू की।
पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर पनागर थाना प्रभारी की टीम ने गांव और आसपास के लोगों से पूछताछ शुरू की।
तफ्तीश की डोर धीरे-धीरे एक नाम तक जा पहुँची
*मैकू कोल*।
जांच में सामने आया कि 2 मार्च की शाम हल्लू कोल और मैकू कोल साथ बैठे थे।
शराब की बोतल खुली, रात गहराती गई, और बातों का रंग बदलने लगा।
पुलिस के अनुसार नशे में हल्लू कोल ने गालियाँ दीं।
पहले चुप्पी रही
फिर गुस्सा जागा
और वही गुस्सा उस रात का *सबसे खतरनाक मेहमान* बन गया।
बताया गया कि रास्ते में धक्का लगा, बुज़ुर्ग पत्थर पर गिरा, फिर उठने की कोशिश की।
लेकिन गुस्सा अब थमने वाला नहीं था।
पास पड़ी लकड़ी उठी
और सिर पर बार बार वार हुए।
कुछ ही मिनटों में खेतों की रखवाली करने वाला वह बुज़ुर्ग वहीं पत्थरों के बीच *खामोश लाश* बन गया।
*सवाल जो अभी भी जिंदा है*
पनागर की उस रात की कहानी सिर्फ़ एक हत्या की कहानी नहीं है।
यह उस सस्ती शराब, उस बेकाबू गुस्से और उन कड़वे लफ्ज़ों की कहानी है जो कभी-कभी इंसान को इंसान से छीन लेती हैं।
क्योंकि सच यह है
कई बार क़त्ल किसी बड़ी साज़िश से नहीं होता,
*वह दो पैग, कुछ गालियों और एक पल के अंधे गुस्से से भी पैदा होता है।*
खैर आज भी ककरहाई तालाब के किनारे हवा जैसे धीरे से पूछती है
क्या उस रात सच में सिर्फ़ एक आदमी मरा था.....
या इंसानियत का एक टुकड़ा भी वहीं पत्थरों पर गिर गया था?
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