हथकड़ी या रजिया का दुपट्टा? नज़ीराबाद थाने से आरोपी ऐसे फिसले जैसे कानून छुट्टी पर हो!

हथकड़ी या रजिया का दुपट्टा? नज़ीराबाद थाने से आरोपी ऐसे फिसले जैसे कानून छुट्टी पर हो!

हथकड़ी या रजिया का दुपट्टा? नज़ीराबाद थाने से आरोपी ऐसे फिसले जैसे कानून छुट्टी पर हो!

Anam Ibrahim 

Journalist_007

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थाना था या सरायखाना? हथकड़ी ने दिया इस्तीफा या कानून ने आँख मूँद ली नज़ीराबाद से दो मुल्ज़िम ‘इज्ज़त समेत’ फरार......

   BBC_OF_INDIA

थाना नज़ीराबाद/देहात/भोपाल :

Bhopal/Mp: हां तो ज़िगरी सुनो ये ताज़ा कहानी एक थाने की है जहाँ दीवारें खड़ी थीं मगर जिम्मेदारी गिर चुकी थी हथकड़ी कसी थी मगर इरादे ढीले थे....और कानून? वो शायद उस रात चौकीदार की नींद में शामिल था!

नज़ीराबाद से जो खबर आई है, वो खबर कम देहात पुलिसिया सिस्टम पर लिखा गया तंज ज्यादा लगती है।

तीन आदतन अपराधी....पुलिस ने पकड़े....मुकदमा लादा.... हथकड़ी पहनाई.... और फिर इत्मीनान से सोच लिया अब ये कहीं नहीं जाएंगे।

यानी खेत में बिजाई करके किसान घर सो गया और रात भर नीलगायों ने फसल पर दावत उड़ा ली।

29 मार्च 2026 पुलिस ने बड़ी मुस्तैदी दिखाते हुए तीन आरोपियों को दबोचा। इल्ज़ाम वही पुराने चोरी की साजिश, अवैध हथियार। नाम भी वही जो फाइलों में बार-बार आते हैं जावेद उर्फ काला, इकबाल खान और एक तीसरा, जो इस कहानी में सबसे बड़ा व्यंग्य बनकर रह गया।

थाने में एंट्री हुई हथकड़ी चढ़ी और जिम्मेदारी उतर गई।

शाम ढली....

अफसर घर चले गए.....

बिट प्रभारी गश्त पर निकल गए.....

और थाने में बचा कानून का ढांचा.... जिसमें जान नहीं थी।

रात आई काली, गाढ़ी और सच्चाई उगलती हुई।

तीनों आरोपी हथकड़ी में जकड़े बैठे थे, मगर दिमाग आज़ाद था।

फुसफुसाहटें चल रही थीं जैसे जेल नहीं, कोई प्लानिंग मीटिंग हो।

बाहर सिपाही के जूतों की टक-टक गूंज रही थी

अंदर हथकड़ी अपनी इज्ज़त खोने की तैयारी कर रही थी।

और फिर हुआ वही जो सिस्टम रोज़ छुपाता है।

चार और सात लॉक वाली पुलिस की “मजबूत” हथकड़ी....

रजिया का दुपट्टा बनकर फिसल गई!

ना कोई शोर.... ना कोई तोड़-फोड़....

बस..... कानून चुपचाप हार गया।

दो आरोपी जावेद उर्फ काला और इकबाल खान थाने से ऐसे निकले जैसे छुट्टी लेकर जा रहे हों।

तीसरा वहीं बैठा रहा 

शायद उसने सोचा भागने से कम गिरेगी पुलिस की मार।

खैर फिर सुबह हुई

और थाने में हड़कंप नहीं बल्कि याद आया कि कुछ जिम्मेदारी भी थी।

फोन घनघनाए

फाइलें खुलीं

और अफसरों के माथे पर पसीना आया जैसे अचानक ईमानदारी का दौरा पड़ा हो।

भोपाल देहात के एसपी ने 5-5 हजार का इनाम घोषित किया।

दो टीमें बनीं जैसे अब कानून को याद आया हो कि वो ज़िंदा है।

24 घंटे में इकबाल खान पकड़ में आ गया

यानी सिस्टम ने आधी सांस वापस ले ली।

मगर जावेद उर्फ काला अब भी फरार है 

और शायद कहीं बैठकर यही सोच रहा होगा

हथकड़ी नहीं टूटी भरोसा टूटा है।

अब सवाल जो रिपोर्ट में नहीं, ज़मीर में दर्ज होते हैं:

क्या थाने अब सुरक्षा के प्रतीक नहीं, लापरवाही के संग्रहालय बन गए हैं?

क्या हथकड़ी सिर्फ फोटो खिंचवाने का सामान रह गई है?

क्या कानून की पकड़ इतनी ढीली हो गई है कि अपराधी “हाथ में सबूत लेकर” निकल जाएं?

कार्यवाही हुई कुछ सस्पेंशन, कुछ नोटिस.....

मगर जनाब, ये सब उस नाव की मरम्मत है जो डूबने के बाद की जाती है।

नज़ीराबाद की ये घटना सिर्फ फरारी नहीं

ये उस सिस्टम का आईना है, जिसमें जिम्मेदारी सबसे पहले फरार होती है।

और जब जिम्मेदारी भागती है तो अपराधी तो निकल ही जाते हैं।

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