मन की बात: मोदी की आवाज़, CM अध्यक्ष की मौजूदगी जनता की खामोशी में लोकतंत्र की गूंज
मन की बात: मोदी की आवाज़, CM-अध्यक्ष की मौजूदगी जनता की खामोशी में लोकतंत्र की गूंज
Anam Ibrahim
Journalist
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मन की बात: जनता सुन रही है....या हाज़िरी लगा रही है?
बूथ पर बैठे लोग, रेडियो पर बोलती सत्ता और बीच में खड़ी एक अदबदार खामोशी।
BBC_OF_INDIA
Bhopal/Indore/Mp:
*भोपाल/इंदौर/मप्र:* रविवार को देश ने फिर ‘मन की बात’ सुनी। देश बड़ा शरीफ़ है हर महीने इत्मीनान से बैठ जाता है, जैसे कोई मास्टरजी हाज़िरी ले रहे हों और बच्चे “प्रेज़ेंट सर” कहने के लिए तैयार हों। फर्क इतना है कि यहाँ मास्टरजी हैं नरेंद्र मोदी जी, और क्लासरूम अब बूथ नंबर 249 और 229 हो गए हैं।
जी हां दोस्तों इंदौर में एक बूथ पर मोहन यादव बैठे थे। पूरा दृष्य बड़ा सुसंस्कृत था नेता जी सुन रहे थे। अब ये अलग बात है कि नेता जब सुनता है, तो देश को तसल्ली होती है कि चलो, बोलने वाला अकेला नहीं है।
उनके साथ कैलाश विजयवर्गीय और तुलसीराम सिलावट भी थे। इतने लोग थे कि लगा, अगर ‘मन की बात’ ज़रा ऊँची आवाज़ में हो जाए तो ये लोग नोट्स भी बना लें कहीं एग्ज़ाम न आ जाए।
उधर भोपाल में हेमंत खंडेलवाल अपने कार्यकर्ताओं के साथ बैठे थे। सबके चेहरे पर एक जैसी शांति थी। ऐसी शांति आम तौर पर दो जगह मिलती है या तो ध्यान में, या फिर जब आदमी समझ नहीं पाता कि अब क्या सोचना चाहिए।
अब ‘मन की बात’ का असली कमाल ये है कि इसमें बोलने वाला एक होता है, और सुनने वाले लाखों। लोकतंत्र में आमतौर पर उल्टा होना चाहिए मगर हमने व्यवस्था को बहुत सलीके से सुधार लिया है। अब जनता बोलती कम है, सुनती ज़्यादा है, और जो सुनती है, वही आगे सुनाती है।
बूथ पर बैठना अब सिर्फ़ वोट डालने के लिए नहीं रह गया। वहाँ अब विचार भी डाले जाते हैं ऊपर से नीचे तक। और सब इतने अनुशासन से होता है कि कभी-कभी शक होता है, ये लोकतंत्र है या कोई बहुत बड़ा पारिवारिक समारोह, जहाँ बड़े बोलते हैं और छोटे जी कहते हैं।
अंत में, मन की बात सुन ली गई।
अब बारी है मन की बात समझने की।
और ये काम थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि मन अब रेडियो पर कम, माहौल में ज़्यादा बसता है।
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