ब्राउन शुगर के सौदागरों का मीठा” धंधा कड़वा हुआ,एरोड्रम पुलिस ने सप्लायर दबोचा, शहर से पूछा:अब भी नींद खुली या और अलार्म चाहिए?

ब्राउन शुगर के सौदागरों का मीठा” धंधा कड़वा हुआ,एरोड्रम पुलिस ने सप्लायर दबोचा, शहर से पूछा:अब भी नींद खुली या और अलार्म चाहिए?

Anam Ibrahim

7771851163

*इंदौर/मप्र:* इंदौर की सड़कों पर कानून चलता है या कानून को टहला-टहला कर थका दिया गया है यह सवाल आज फिर खड़ा हो गया। नील चौराहे के अँधेरे ने एक मोटरसाइकिल सवार युवक को देखा, डायरेक्ट युवक ने पुलिस को देखा, और फिर गांधी के तीन बंदरों की चौथी कड़ी सामने आ गई भागते रहो, कुछ मत बोलो। लेकिन पुलिस ने मैरे अंदाज़ में कहा “भाई, व्यंग्य हम लिखते हैं, दौड़ तुम क्यों लगा रहे हो?” खैर और घेराबंदी कर उसे पकड़ लिया।

तलाशी हुई तो जेब से निकली शराफत नहीं, बल्कि 4.80 ग्राम ब्राउन शुगर। पुलिस के अनुसार यह छोटा-सा पैकेट वही बड़ा सच बोल रहा था, जिसे समाज अक्सर मुझे क्या कहकर सोफे के नीचे झाड़ू से धकेल देता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसका दाम तकरीबन ₹50,000 यानी उतना कि ग़ालिब के जमाने में कई महीने की शायरी आराम से निकल आए, और आज किसी के घर का चैन छिन जाए।

गिरफ्तार युवक की पहचान सचिन आर्य (उम्र 24), निवासी राधा गोविंद का बगीचा, रावजी बाजार के रूप में हुई। उसके खिलाफ धारा 8/21 NDPS Act के तहत प्रकरण दर्ज यह वही धारा है, जिसे सुनते ही अमीर खुसरो का शेर भी सरकारी भाषा में खड़ा हो जाता है। पुलिस कहती है काफी समय से वह इस इलाके में सप्लाई कर रहा था और पहले भी उस पर दो प्रकरण दर्ज हैं। बाकी कहानी की कड़ियाँ जोड़ी जा रही हैं नेटवर्क, साथी, गुरुपरंपरा मतलब अवैध गुरुकुल का प्रवेश फार्म भी तलाश में है।

इस कार्रवाई का श्रेय भी सूचीबद्ध हुआ पुलिस आयुक्त के निर्देश, जोन-1 की कठोर नजरें, एरोड्रम थाना प्रभारी तरुण भाटी और उनकी टीम की मेहनत उप निरीक्षक, प्रधान आरक्षक, आरक्षक सबकी भूमिकाएँ सराहनीय बताई गईं। जनता ने ताली नहीं बजाय, पर सोचा जरूर वाह री किस्मत, जिसने पकड़ना था वही जाग गया, और जिसे जागना था वह अभी भी री-स्नूज़ पर है। 

और समाज? समाज वही पुराना समझदार बच्चा जो परीक्षा कल हो तो आज भी पेंसिल छीलता रहता है। नशा बिकता है, तब हम कहते हैं ये बच्चों का मामला है जब बच्चों तक पहुँचता है तब कहते हैं ये समाज का मामला है, और जब घर तक पहुँचता है तब याद आता है कि मामला हमारा था। मुकेश होता तो कहता “शहर शरीफ है, बस इसकी गलियों को बुरा संग लग गया है।”

यह खबर कोई हीरो नहीं बनाती ना पुलिस का पोस्टर, ना अपराध का रोमांस। यह बस पूछती है

ब्राउन शुगर मीठी नहीं होती, मगर उसके बहाने हमारी कड़वाहट क्यों बढ़ती जा रही है?

कानून पकड़ लेता है, पर क्या हमारी आदतें भी कभी पकड़ी जाएँगी?

बाकी, ग़ालिब कह गए थे

हमने माना नशा बुरा है ग़ालिब,

पर बुरा वो भी नहीं जो रोक ले।

तो खबर यही है एक सप्लायर पकड़ा गया, नेटवर्क की पड़ताल जारी है, और शहर से उम्मीद है कि वह सिर्फ़ तमाशबीन नहीं, जागरूक गवाह बने। क्योंकि नशे का व्यापार सिर्फ पुलिस की समस्या नहीं यह हमारे समय की सामूहिक नींद का सर्टिफिकेट है।