थाना कोहेफिजा की रात में रंजिश ने कारतूस उगले, खंजर चमके और तीन जिस्म ख़ून से तर हुए!!
थाना कोहेफिजा की रात में रंजिश ने कारतूस उगले, खंजर चमके और तीन जिस्म ख़ून से तर हुए!!
Anam Ibrahim
Journalist
7771851163
एक लड़की, दो गुट और आधी रात को बारूद की धांय-धांय
एक पुराने विवाद ने कोहेफिजा की गली को गोलियों, चीख़ों और ख़ौफ़ के हवाले कर दिया!!
बरेलागांव में आधी रात गोलियाँ गरजीं, खंजर चमके और मोहल्ला देर तक ख़ौफ़ की चादर ओढ़े जागता रहा!!
जनसम्पर्क Life
BBC_OF_INDIA
Bhopal/Mp: थाना कोह-ए-फिज़ा के बरेलागांव की उस रात को अगर कोई नाम देना हो तो उसे "अदावत की जागीर" कहा जा सकता है।
रात सोना चाहती थी, मगर रंजिश जाग रही थी।
गली ख़ामोश थी, मगर कुछ सीने पुराने हिसाब-किताब से भरे हुए थे। हवा में कोई तूफ़ान दिखाई नहीं देता था, लेकिन भीतर-भीतर बारूद की एक महीन गंध तैर रही थी। फिर अचानक वह हुआ, जो हर समझदार समाज टालना चाहता है और हर बेअक़्ल रंजिश किसी न किसी दिन कर बैठता है।
कोहेफिजा के बरेलागांव में शनिवार और रविवार की दरम्यानी रात पुरानी दुश्मनी ने अपने चेहरे से अचानक नक़ाब उतार दिया।
पुलिस के मुताबिक़ विवाद की जड़ एक युवती को लेकर चला आ रहा पुराना झगड़ा था। मगर मोहल्लों की ऐसी कहानियों में वजह अक्सर उतनी बड़ी नहीं होती, जितना बड़ा उसे बना दिया जाता है। कई बार मामला किसी इंसान का नहीं, अहंकार का होता है। और जब अहंकार हथियार उठा ले, तो फिर अक़्ल सबसे पहले घायल होती है।
बताया जाता है कि बाजपेयी नगर मल्टी निवासी 22 वर्षीय संजय उर्फ़ सन्नी नरवरिया, जो विजय नगर निवासी गुफ़रान के साथ केटरिंग का काम करता है, उसी सिलसिले में घटनास्थल पर था। गुफ़रान के दोस्त साहिल और बरेलागांव निवासी रहमान उर्फ़ गोलू के बीच पुरानी तनातनी चली आ रही थी।
रात ने जैसे ही अपने साए गहरे किए, दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए।
कुछ तल्ख़ लफ़्ज़ उछले।
कुछ पुराने ज़ख़्म कुरेदे गए।
कुछ निगाहों ने एक-दूसरे को ललकारा।
और फिर इंसान पीछे हट गया, हथियार आगे आ गए।
आरोप है कि रहमान ने अपने साथी कैफ़ उर्फ़ लाला को बुलाया। कुछ ही देर बाद पिस्तौल निकली और ख़ामोशी का सीना चीरती हुई दो गोलियाँ दाग दी गईं।
इत्तेफ़ाक़न एक गोली संजय उर्फ़ सन्नी को छूती हुई निकल गई।
उस एक पल में शायद ज़िंदगी और मौत आमने-सामने खड़ी थीं।
एक इंच इधर या उधर होता तो आज कहानी अस्पताल की नहीं, किसी घर के मातम की होती।
लेकिन बारूद का नशा अक्सर यहीं नहीं रुकता।
गोली चलने के बाद दोनों पक्षों के बीच चाकूबाज़ी और मारपीट शुरू हो गई। अंधेरी रात में धारदार हथियार ऐसे चमक रहे थे जैसे किसी ने चाँदनी को ख़ून में डुबो दिया हो। कुछ मिनटों तक बरेलागांव की वह गली इंसानों की बस्ती कम और घायल ग़ुस्सों का मैदान ज़्यादा लग रही थी।
चीख़ें उठीं।
लोग घरों से झाँके।
दरवाज़े आधे खुले, आधे बंद रहे।
माएँ अपने बच्चों को भीतर खींचने लगीं।
और मोहल्ला यह सोचकर सहम गया कि पता नहीं अगली गोली किस दिशा का रास्ता चुन ले।
इस हिंसक भिड़ंत में तीन लोग घायल हुए। दो बदमाश चाकूबाज़ी में ज़ख़्मी हुए जबकि संजय गोली की चपेट में आया। सभी घायलों को उपचार के लिए अस्पताल पहुँचाया गया।
कोहेफिजा पुलिस ने दोनों पक्षों के ख़िलाफ़ हत्या के प्रयास का मामला दर्ज कर चार आरोपियों को हिरासत में ले लिया है। तफ़्तीश जारी है।
मगर पुलिस की केस डायरी से बाहर भी इस वारदात का एक दूसरा पन्ना है।
वह पन्ना किसी एफआईआर में नहीं मिलता।
वह उन बूढ़ी आँखों में मिलता है जो आधी रात गोलियों की आवाज़ सुनकर चौंक जाती हैं।
वह उन बच्चों की नींद में मिलता है जो पहली बार समझते हैं कि पटाखे और गोलियों की आवाज़ में कितना फ़र्क़ होता है।
वह उन माँओं के दिल में मिलता है जो हर बार बेटे के देर से घर लौटने पर सौ दफ़ा दरवाज़े की तरफ़ देखती हैं।
बरेलागांव की सड़क से ख़ून धुल जाएगा।
कारतूस उठा लिए जाएँगे।
ज़ख़्मों पर पट्टियाँ भी बँध जाएँगी।
मगर एक सवाल फिर भी वहीं पड़ा रहेगा
अनम आख़िर हमारे मोहल्लों में रंजिशें इतनी ताक़तवर कब हो गईं कि बात करने वाले होंठ हार जाते हैं और गोली चलाने वाली उँगलियाँ जीत जाती हैं?
और शायद यही इस पूरी वारदात का सबसे ख़ौफ़नाक हिस्सा है। क्योंकि गोली जिस्म को घायल करती है, मगर ऐसी घटनाएँ शहर की रूह को ज़ख़्मी कर जाती हैं।
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