केन-बेतवा के पानी से पहले आदिवासियों की ज़मीन डूबी छतरपुर में दर्द सुनने पहुँची कांग्रेस पर बैरिकेड खड़े हो गए!

केन-बेतवा के पानी से पहले आदिवासियों की ज़मीन डूबी छतरपुर में दर्द सुनने पहुँची कांग्रेस पर बैरिकेड खड़े हो गए!

केन-बेतवा के पानी से पहले आदिवासियों की ज़मीन डूबी छतरपुर में दर्द सुनने पहुँची कांग्रेस पर बैरिकेड खड़े हो गए!

Anam Ibrahim

Journalist 

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ढोढन बाँध पर उजड़ते आदिवासी, बैरिकेडों में घिरा विपक्ष,मप्र की सियासत में ‘बाघ’ पहली बार इतने संवेदनशील दिखे!!

छतरपुर के ढोढन बाँध पर जीतू पटवारी को रोकने के लिए बैरिकेड, पुलिस और वन्यजीवों की दलील केन-बेतवा परियोजना के बीच उजड़ते आदिवासियों का दर्द फिर मप्र की सियासत के बीचोंबीच आ खड़ा हुआ।

    BBC_OF_INDIA

     जनसम्पर्क Life 

ख़बर मप्र कांग्रेस दफ़्तर से........

मशीनों से जंगल नहीं काँपा मगर आदिवासियों से मिलने निकले जीतू पटवारी से ‘बाघ परेशान’ हो गए!

केन-बेतवा परियोजना के साए में उजड़ते गाँव, बैरिकेडों में कैद लोकतंत्र,मप्र की सियासत में अब जंगल से ज़्यादा ख़तरनाक सवाल माने जा रहे हैं।

Bhopal/ Chhatarpur/Mp: मध्यप्रदेश के छतरपुर स्थित ढोढन बाँध इलाके में इन दिनों नदी कम, सियासत ज़्यादा बह रही है। केन-बेतवा लिंक परियोजना की चमचमाती सरकारी फ़ाइलों के पीछे आदिवासियों और किसानों की उजड़ती दुनिया दबती जा रही है। मगर जब जीतू पटवारी वहाँ विस्थापित परिवारों का दर्द सुनने पहुँचे, तो अचानक पूरा प्रशासन ऐसे हरकत में आ गया मानो कोई विपक्षी नेता नहीं, जंगल में लोकतंत्र की आख़िरी आवाज़ दाख़िल हो रही हो।

भारी पुलिस बंदोबस्त, बैरिकेडिंग, रोक-टोक और ऊपर से दलील ऐसी कि सुनकर दिमाग़ हिल जाए 

“नेताओं के जाने से बाघ, चीते और वन्यजीव प्रभावित होंगे!”

 बहरहाल जंगल मे 

दिन-रात धरती का कलेजा चीरती मशीनें, धमकते डंपर, काँपते पहाड़, कटते जंगल और सैकड़ों मजदूरों की आवाजाही से वन्यजीवों को एलर्जी नहीं हुई! मगर आदिवासियों का हाल पूछने निकला विपक्ष जंगल के लिए ख़तरा बन गया!!

असल में डर जंगल का नहीं, सवालों का है।

डर उस सच्चाई का है जो ढोढन बाँध के पानी से ऊपर तैर रही है कि “विकास” की इस इबारत में आदिवासी सिर्फ़ आँकड़ा बनकर रह गया है। उसकी ज़मीन ली जा रही है, मगर बदले में सम्मानजनक पुनर्वास अब भी सरकारी भाषणों की लकड़ी पर टंगा हुआ वादा है।

कांग्रेस का इल्ज़ाम है कि Mohan Yadav सरकार आदिवासियों और किसानों को न्याय देने में नाकाम रही है। जमीन के बदले जमीन की माँग अब भी अधूरी है और मुआवज़े की फ़ाइलें सरकारी दफ़्तरों में वैसे ही घूम रही हैं जैसे चुनाव के मौसम में नेता गाँव-गाँव घूमते हैं।

जीतू पटवारी ने इसे “जल, जंगल और ज़मीन” की लड़ाई बताया और साफ़ कहा कि कांग्रेस पीछे हटने वाली नहीं। मगर सवाल ये है कि क्या मध्यप्रदेश में अब विपक्ष का पीड़ितों से मिलना भी “वन्यजीव संकट” की श्रेणी में आ गया है?