बीजेपी के शक्ति-शोर के बीच कांग्रेस ने भी, मीनाक्षी के नामांकन पर उतारा भोपाल की सड़कों पर लश्कर!

बीजेपी के शक्ति-शोर के बीच कांग्रेस ने भी, मीनाक्षी के नामांकन पर उतारा भोपाल की सड़कों पर लश्कर!

बीजेपी के शक्ति-शोर के बीच कांग्रेस ने भी, मीनाक्षी के नामांकन पर उतारा भोपाल की सड़कों पर लश्कर!

Anam Ibrahim 

Journalist 

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ख़बर PCC कांग्रेस दफ़्तर से....

राज्यसभा की रस्म अदायगी से ज़्यादा वजूद बचाने की कवायद; पटवारी, दिग्विजय, सिंघार से लेकर पुराने सरदार एक मंच पर 

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Bhopal/Mp: भोपाल की सियासत इन दिनों अजब तमाशा देख रही है। उधर भाजपा अपने बारह बरस के फ़तहनामे, तरक़्क़ी के तरानों और इक्तेदार के जलवों का मेला लगाए बैठी है, इधर कांग्रेस ने भी मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा नामांकन को महज़ एक दस्तख़त की रस्म नहीं रहने दिया। इंदिरा भवन से विधानसभा तक निकलने वाला क़ाफ़िला दरअसल उस पार्टी का जवाबी ऐलान होगा, जिसके बारे में बरसों से सियासी बाज़ार में बिखराव, बेदिली और बेवक़ार होने की अफ़वाहें बेची जाती रही हैं आज भोपाल में कांग्रेस की हाज़िरी परेड के........

बहरहाल आज राज्यसभा का पर्चा, कांग्रेस का वजूद: भोपाल में सजेगा कुनबे की एकजुट दिखाने का सियासी मंच

मीनाक्षी नटराजन के नामांकन के बहाने दिग्विजय से पटवारी तक एक सफ़ में; संदेश साफ़ विपक्ष अभी सियासत की किताब से ख़ारिज नहीं हुआ है

खैर सियासत बड़ी अजीब शय है। जब ताक़त कम पड़ती है तो तादाद दिखाई जाती है, और जब तादाद कम पड़ती है तो तस्वीरें।

आज सोमवार को प्रदेश कांग्रेस कार्यालय इंदिरा भवन से विधानसभा की तरफ़ बढ़ने वाला काफ़िला सिर्फ़ राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नहीं होगा, बल्कि उस कांग्रेस का भी होगा जो बरसों से हार, हाशिये और हौसले के बीच अपना वजूद बचाए रखने की जद्दोजहद में लगी हुई है।

नामांकन का पर्चा तो मीनाक्षी नटराजन दाख़िल करेंगी, मगर असल में कांग्रेस अपने सियासी हस्ताक्षर दर्ज कराने निकलेगी। इंदिरा भवन में प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी, प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, अजय सिंह, कांतिलाल भूरिया, अरुण यादव और दूसरे वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी यह बताने की कोशिश करेगी कि पार्टी के भीतर मतभेदों की फुसफुसाहट चाहे जितनी हो, कैमरे के सामने तस्वीर अभी भी मुकम्मल दिखाई जा सकती है।

सियासी गलियारों में इसे महज़ नामांकन नहीं, बल्कि कांग्रेस की "हाज़िरी परेड" की तरह भी देखा जा रहा है। ऐसे वक़्त में जब सत्ताधारी भाजपा अपने बारह साल के फ़तहनामे, विकास यात्रा और संगठनात्मक ताक़त का ढोल बजा रही है, कांग्रेस भी भोपाल से यह पैग़ाम देना चाहती है कि विपक्ष की बेंच अभी खाली नहीं हुई है।

दिलचस्प यह भी है कि राज्यसभा की इस रस्मी जंग में न जीत का रोमांच है, न हार का ख़ौफ़। असली लड़ाई तस्वीर की है, तास्सुर की है और उस सियासी एहसास की है जो कार्यकर्ता के दिल में यह यक़ीन ज़िंदा रखे कि पार्टी अभी मंजर से ग़ायब नहीं हुई।

भोपाल में सोमवार को दाख़िल होने वाला पर्चा भले एक उम्मीदवार का होगा, लेकिन उसके पीछे खड़ी भीड़ दरअसल एक सवाल का जवाब देने निकलेगी क्या कांग्रेस अभी भी मध्यप्रदेश की सियासत में गिनी जाती है?

इंदिरा भवन से विधानसभा तक का यह सफ़र शायद उसी सवाल का जवाब लिखने की कोशिश होगा। क्योंकि सियासत में कई बार सीट से बड़ी चीज़ मौजूदगी होती है, और कांग्रेस फिलहाल वही दर्ज कराने निकल रही है।

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