कांग्रेस पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह गरजे ‘राजीव गांधी का नाम हटाना शिक्षा नहीं, इतिहास की रूह पर हमला है’!!

कांग्रेस पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह गरजे ‘राजीव गांधी का नाम हटाना शिक्षा नहीं, इतिहास की रूह पर हमला है’!!

कांग्रेस पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह गरजे ‘राजीव गांधी का नाम हटाना शिक्षा नहीं, इतिहास की रूह पर हमला है’!!

Anam Ibrahim 

Journalist_007

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भोपाल में ‘राजीव गांधी’ नाम हटाने की दस्तक से गरमाई मप्र की राजनीति!

तालीम के माथे से इतिहास का नाम नोचने की साज़िश?!!

इल्म के दरवाज़ों पर सियासत इतिहास के ताबूतों में ठोंक रहा है वैचारिक कील!!!

     Jansampark Life 

      BBC_OF_INDIA 

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Bhopal/Mp: भोपाल यह सिर्फ़ एक नाम हटाने का मामला नहीं रहा, यह उस सोच का आईना बन गया है जिसमें सत्ता अपने विरोधियों को इतिहास की किताबों, इमारतों और आने वाली नस्लों की यादों से मिटा देना चाहती है।

 जी हां दोस्तों 

भोपाल में अब विश्वविद्यालय नहीं, इतिहास का पोस्टमार्टम होगा!

 मप्र की भाजपा सरकार आरजीपीवी से ‘राजीव गांधी’ नाम हटाने चली है पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह बोले: यह तालीम नही, वैचारिक मुर्दाघर खड़ा करने की तैयारी है’

बहरहाल 

इस देश में सरकारें अब सड़क, पानी, रोज़गार और अस्पताल कम बनाती हैं! दुश्मन ज़्यादा बनाती हैं!!

और जब असली दुश्मन नहीं मिलता, तब इतिहास की कब्रें खोद ली जाती हैं।

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में इन दिनों एक विश्वविद्यालय कटघरे में खड़ा है। उसका अपराध यह नहीं कि वहाँ पढ़ाई खराब है, प्रयोगशालाएँ जर्जर हैं, या छात्रों की नौकरियाँ अंधे कुएँ में गिर रही हैं। उसका सबसे बड़ा अपराध यह है कि उसके नाम के आगे “राजीव गांधी” लिखा हुआ है।

अब सरकार उसे सुधारने नहीं, “शुद्ध” करने निकली है।

राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय यानी आरजीपीवी को तीन हिस्सों में बांटने और उससे राजीव गांधी का नाम हटाने की तैयारी चल रही है। सरकार कह रही होगी यह प्रशासनिक सुधार है। जैसे कसाई बकरे से कहता है “तुम्हारी गर्दन पर छुरी नहीं फेर रहा, व्यवस्था ठीक कर रहा हूँ।”

पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह इस पूरे घटनाक्रम पर भड़क उठे हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि भाजपा सरकार विश्वविद्यालय का विकास नहीं, बल्कि इतिहास की धुलाई करना चाहती है।

उन्होंने कहा कि जिस आदमी ने इस देश में कंप्यूटर की पहली खिड़की खोली, जिसे उस ज़माने में लोग कंप्यूटर वाला प्रधानमंत्री कहकर चिढ़ाते थे, उसी राजीव गांधी का नाम आज सत्ता को काँटे की तरह चुभ रहा है।

यह बड़ा मज़ेदार देश है।

यहाँ नेता मर जाता है, मगर उससे डरने वाले लोग नहीं मरते।

राजीव गांधी की हत्या हुए बरसों बीत गए, मगर उनका नाम आज भी कुछ लोगों की राजनीति का ब्लड प्रेशर बढ़ा देता है।

भाजपा को अगर विश्वविद्यालय की इतनी ही चिंता है तो पहले यह बता दे कि कितने इंजीनियर बेरोज़गार घूम रहे हैं? कितनी लैबों में मशीनें जंग खा रही हैं? कितने छात्र फीस के बोझ से टूट रहे हैं?

मगर नहीं!!!!

इन सवालों में वोट नहीं है।

वोट तो नाम बदलने में है। पट्टिकाएँ उखाड़ने में है। इतिहास की हड्डियाँ खोदने में है।

आजकल सरकारें विकास कम करती हैं, उद्घाटन ज़्यादा करती हैं।

और जब उद्घाटन के लिए कुछ नहीं बचता, तब पुराने नामों का अंतिम संस्कार शुरू कर देती हैं।

अजय सिंह ने कहा कि यह विश्वविद्यालय का विभाजन नहीं, वैचारिक खुन्नस का सरकारी संस्करण है। भाजपा हर महापुरुष को इस तराज़ू में तौलती है कि वह अपना था या दूसरे दल का। जैसे देश नहीं, कोई निजी दुकान चल रही हो।

कल अगर न्यूटन भारत में पैदा होता और किसी दूसरी पार्टी के दौर में गुरुत्वाकर्षण खोज लेता, तो शायद उसका नियम भी बदल दिया जाता।

जो भी हो भोपाल के नौजवान अभी से बेचैन है।

छात्र समझ रहे हैं कि सरकार को उनकी डिग्री से ज़्यादा बोर्ड पर लिखे नाम की चिंता है।

और जनता समझ रही है कि जब सत्ता असली मुद्दों पर थक जाती है, तब इतिहास के कब्रिस्तान में राजनीति करने चली जाती है।

यह वही देश है जहाँ भूखा आदमी रोटी मांगता है और नेता उसे नया नाम दे देता है।

अजय सिंह ने चेतावनी दी है कि कांग्रेस और जनता इस फैसले का विरोध करेगी। मगर असली सवाल विरोध का नहीं है। सवाल यह है कि क्या आने वाले समय में इस देश में इतिहास भी चुनावी घोषणा पत्र देखकर जिया करेगा?

क्योंकि अब हालत यह है कि

यहाँ विश्वविद्यालयों में ज्ञान कम, वैचारिक सेनिटाइज़र ज़्यादा छिड़का जा रहा है।

ताकि आने वाली पीढ़ियाँ किताब पढ़ने से पहले यह पूछें 

“सर, यह नाम किस पार्टी का था?”