उमर खालिद को जमानत न देने वाले अपने ही फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की ठंडी आह!!!
उमर खालिद को जमानत न देने वाले अपने ही फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की ठंडी आह!!!
Anam Ibrahim
Journalist
7771851163
उमर खालिद केस में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले पर उठाए सवाल!!
अदालत बोली, बेल नियम थी’ मगर तब तक कई साल जेल के सज़ा बन चुके थे!!!
*UAPA की कालकोठरियों, अधूरी सुनवाइयों और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ की लोहे की ज़ंजीरों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने जब अपने पुराने फैसलों की तरफ देखा, तो लगा जैसे अदालत ने पहली बार सलाखों पर जमी इंसानी सीलन को छुआ हो!*
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नई दिल्ली/सुप्रीम कोर्ट:
नई दिल्ली अदालत के कमरे बड़े बेरहम होते हैं। वहां आंसू भी दलील बनकर गिरते हैं और ज़िंदगी फाइलों की तरह “अगली तारीख” पर सरका दी जाती है। लेकिन सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में कुछ पल ऐसे भी आए, जब लगा कि कानून की मोटी किताबों के बीच कहीं दबा इंसान अचानक कराह उठा हो।
हां मियां यूनुस जेलें बड़ी अजीब जगह होती हैं।
वहां रात जल्दी नहीं गुजरती।
वहां दीवारें भी आदमी को ऐसे देखती हैं जैसे वह अदालत से नहीं, कब्र से लौटकर आया हो।
और सबसे ख़ौफ़नाक बात यह है कि वहां बहुत से लोग सज़ायाफ्ता नहीं होते सिर्फ “आरोपी” होते हैं।
उमर खालिद भी बरसों से ऐसी ही एक लंबी रात के भीतर रखा हुआ नाम है।
एक ऐसा नाम, जिसे अदालत से पहले टीवी ने कठघरे में खड़ा किया
जिसे मुकदमे से पहले बहसों ने मुजरिम बनाया!
और जिसे कानून ने शायद बाद में याद किया!!
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Umar Khalid और Sharjeel Imam को जमानत न देने वाले पुराने फैसलों में NIA बनाम KA Najeeb के उसूलों का ठीक तरह से पालन नहीं हुआ था।
अदालत ने यह भी दोहराया
“बेल नियम है, जेल अपवाद।”
यह वाक्य अदालत के कमरे में बहुत सलीके से बोला गया होगा!
मगर जेल की कोठरी में यह किसी थके हुए कैदी की हंसी जैसा सुनाई देता है।
क्योंकि हुज़ूर!!
जब आदमी पांच-पांच साल सलाखों के पीछे गुजार दे, तब “बेल नियम है” कहना वैसा ही है जैसे किसी लाश के सिरहाने खड़े होकर कहना
“इलाज़ तो मुमकिन था।”
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच एक कथित नार्को-टेरर मामले की सुनवाई कर रही थी। आरोपी पांच साल से ज़्यादा जेल में रहा। अदालत ने देखा कि प्रत्यक्ष बरामदगी तक नहीं थी।
और तब अदालत को संविधान याद आया।
संविधान!!
यह इस देश की सबसे शरीफ किताब है।
हर कोई इसकी इज़्ज़त की बात करता है, मगर मुश्किल वक़्त में सबसे पहले इसी को अलमारी में बंद कर देता है।
UAPA का नाम आते ही अदालतों की हवा बदल जाती है।
फाइलें भारी हो जाती हैं।
जमानत पतली हो जाती है।
और इंसान छोटा।
यह कानून अब सिर्फ अदालत में नहीं चलता।
यह न्यूज़ चैनलों की चीखों में चलता है....
सोशल मीडिया की लानतों में चलता है!!
और उन आंखों में चलता है, जो किसी आरोपी को अदालत से पहले दुश्मन मान लेती हैं।
Umar Khalid की कहानी शायद अब एक आदमी की कहानी नहीं रही।
यह उस मुल्क की कहानी बन गई है, जहां कानून कभी-कभी इंसाफ देने से पहले आदमी की उम्र गिरवी रख लेता है।
अदालत ने कहा
“निर्दोषता की धारणा सभ्य समाज की बुनियाद है।”
बहुत खूबसूरत जुमला है।
इतना खूबसूरत कि जेल की सीलन में अक्सर सड़ जाता है।
क्योंकि यहां “निर्दोष” वही माना जाता है, जो या तो मर चुका हो!!
या बरसों बाद बरी हुआ हो!!!
बाकी सब लोग अदालत और जेल के बीच लटके रहते हैं
बिना फैसले के!
बिना राहत के!!
बिना इस यकीन के कि कानून उन्हें इंसान समझता भी है या नहीं।
और शायद सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार यह महसूस किया कि जेल सिर्फ लोहे की सलाखों से नहीं बनती
कभी-कभी अदालत की देर से भी बनती है।
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