इंदौर थाना विजय नगर : जिस थाली में रिज़्क़ मिला, उसी में ज़हर घोल आया मुलाज़िम

इंदौर थाना विजय नगर : जिस थाली में रिज़्क़ मिला, उसी में ज़हर घोल आया मुलाज़िम

इंदौर थाना विजय नगर : जिस थाली में रिज़्क़ मिला, उसी में ज़हर घोल आया मुलाज़िम

Anam Ibrahim 

Journalist

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थाना विजय नगर : नौकरी से निकाले गए मुलाज़िम ने वफ़ादारी की लाश पर डाली चोरी की चादर "रिज़्क़ गया तो ज़मीर भी बिक गया!”

ऑफ़िस की कुर्सी छिनी तो दराज पर टूटा इन्तेक़ाम, 1.70 लाख उड़ा कर पूर्व कर्मचारी ने साबित कर दिया कि बेरोज़गारी से पहले इंसानियत मरती है। विजय नगर पुलिस ने चन्द घंटों में नकाबपोश बदलेबाज़ को बेनक़ाब कर दिया।

 नौकरी गई तो गैरत भी बिक गई जिस दफ़्तर की रोटी खाई, उसी की दराज़ चबा गया मुलाज़िम!

निकाले जाने की खुन्नस में पूर्व कर्मचारी बना नकाबपोश चोर 1.70 लाख पार !!

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कहते हैं इंतिक़ाम जब तहज़ीब का गला घोंट दे, तो आदमी चोर नहीं रहता बस अपने ही एहसान का क़ातिल बन जाता है। इंदौर में नौकरी से निकाले गए शख्स ने उसी दफ़्तर की दराज़ लूट ली जहाँ कभी उसकी भूख को रोटी मिला करती थी।

Indore/Mp: इंदौर की सरज़मीं पर एक और वाक़िआ हुआ, मगर ये सिर्फ़ चोरी का वाक़िआ नहीं

ये तो अनम इंसान के गिरते हुए ज़मीर का मरसिया है।

जिस हाथ ने कभी दफ़्तर की फ़ाइलें उठाई!

आज उसी हाथ ने दराज से नोट नोच लिए!!

जिस चौखट से कभी सुबह की उम्मीद मिलती थी!!!

आज उसी चौखट पर बदले का अंधेरा थूक दिया गया।

विजय नगर के एन.आर.के. बिज पार्क में बैठे लोग शायद ये समझते रहे होंगे कि चोर बाहर की गलियों में फिरते हैं।

मगर उन्हें क्या ख़बर थी कि अस्ल लुटेरे तो कुर्सियों पर बैठकर मुस्कुराते हैं, सर कहते हैं, चाय पीते हैं और मौक़ा मिलते ही भरोसे की गर्दन काट देते हैं।

05 मई 2026 को जब दीपक काले ने पुलिस को बताया कि ऑफिस की दराज़ से 1 लाख 70 हज़ार रुपये गायब हैं, तब मामला महज़ रुपयों का नहीं रहा।

मामला उस एहसान का था जिसे आजकल लोग तनख़्वाह समझ बैठते हैं।

पुलिस ने कैमरों की आंखों से सच निचोड़ा।

150 CCTV फुटेज के जंगल में एक ऐसा साया घूमता मिला जिसने चेहरे पर रूमाल बाँध रखा था, मगर उसकी नीयत का चेहरा नंगा था।

सायबर सेल और मुखबिरों ने जब नकाब हटाया, तो चेहरा निकला संजय बड़ोदिया।

वही शख्स जिसे कुछ रोज़ पहले नौकरी से हटाया गया था।

खैर अफ़सोस

रिज़्क़ छिनते ही उसने मेहनत का दरवाज़ा नहीं खटखटाया।

उसने चोरी का ज़ीना चढ़ना पसंद किया।

उसने पुलिस के सामने इकबाल किया कि नौकरी छूटने की जलन उसके सीने में अंगार बनी हुई थी।

सो उसने पहले दफ़्तर की रेकी की, फिर रात की तन्हाई में उसी जगह पर धावा बोल दिया जहाँ कभी उसे रोज़ी मिला करती थी।

1 लाख 70 हज़ार में से 1 लाख 50 हज़ार रुपये बरामद हुए।

बाकी रकम जनाब खा-पी गए और गाड़ी में झोंक आए।

हराम की दौलत का यही मिज़ाज होता है 

वो जेब में कम, बदनामी में ज़्यादा खर्च होती है।

थाना प्रभारी चन्द्रकांत पटेल और उनकी टीम ने चंद घंटों में इस आस्तीन के सांप को दबोच लिया।

मगर सवाल पुलिस से बड़ा है।

ये दौर आखिर किस करवट बैठ रहा है?

जहाँ नौकरी छूटते ही आदमी अपनी औकात से गिरकर चोर बन जाता है।

जहाँ वफ़ादारी अब कॉन्ट्रैक्ट की तारीख तक ज़िंदा रहती है।

जहाँ एहसान का बदला शुक्रिया नहीं, चोरी से दिया जाता है।

अगर उस्तादन ये मंज़र देखती , तो शायद रो पड़ती 

कि इस दौराने ज़िन्दगी मे इंसान अब फ़ाक़ों से नहीं, अपने लालच से मर रहा है।

हां ये भी सच है की 

जिस दिल में सब्र मर जाए, वहाँ शैतान सजदा करता है।

जिस क़ौम के नौजवान मेहनत छोड़ दें,

वो पहले किरदार हारते है, और फिर...........