जबलपुर रात की रगों में दौड़ता ख़ाकीधारियों का कॉम्बिग गश्त: 222 वारंटों की दस्तक, गुनाह की ख़ामोशी चीख़ उठी!

जबलपुर रात की रगों में दौड़ता ख़ाकीधारियों का कॉम्बिग गश्त: 222 वारंटों की दस्तक, गुनाह की ख़ामोशी चीख़ उठी!

जबलपुर रात की रगों में दौड़ता ख़ाकीधारियों का कॉम्बिग गश्त: 222 वारंटों की दस्तक, गुनाह की ख़ामोशी चीख़ उठी!

Anam Ibrahim

Journalist-007

7771851163

कागज़ों में सोता क़ानून अचानक जागा जबलपुर में 222 वारंटों की नींद खुली, मुजरिम बोले: हुज़ूर, हमें याद कैसे कर लिया?

सालों से फरार चेहरे आज पकड़े गए कॉम्बिंग गश्त या याददाश्त की एक्सरसाइज़? क़ानून ने एक रात में ‘भूले हुए गुनाह तलाश लिए!!!

BBC_OF_INDIA

      ख़बर जबलपुर/मप्र से...........

 *Jabalpur/Mp:* जबलपुर में क़ानून को अचानक याद आया कि उसके पास कुछ पुराने काम भी पड़े हैं। जैसे घर के कोने में पड़ी पुरानी अलमारी खुलती है और उसमें से धूल खाए कागज़ निकलते हैं, वैसे ही इस बार पुलिस ने अपनी फाइलें झाड़ीं और जनाब, 222 वारंट मिल गए! कप्तान 

सम्पत उपाध्याय के निर्देश पर 2 मई की रात से 3 मई की सहर तक पुलिस ने कॉम्बिंग गश्त का सिलसिला शुरू किया। यह गश्त कुछ वैसी ही थी जैसे परीक्षा से एक रात पहले छात्र को अचानक किताबों से मोहब्बत हो जाए।

आयुष गुप्ता, जितेन्द्र सिंह, सूर्यकांत शर्मा और अंजना तिवारी की अगुवाई में शहर और देहात की पुलिस ऐसे निकली जैसे बरसों बाद किसी खैमे मे सामूहिक ज़िम्मेदारी का जज़्बा उभर आया हो।

फिर क़्या था अलग अलग टीमें बनीं दबिशें पड़ीं.....

और जो लोग सालों से पुलिस को देखकर रास्ता बदल लेते थे, वो इस बार सीधे पुलिस की गाड़ी में बैठ गए।

119 गैर-मियादी वारंट, 78 गिरफ्तारी वारंट और 25 जमानती वारंट कुल 222।

यानी इतने लोग तो खुद भी भूल गए होंगे कि वो ‘फरार’ चल रहे हैं।

मुजरिम भी हैरान थे 

अरे, हम तो समझे थे मामला ठंडा पड़ गया!

पुलिस बोली “नहीं भैया, बस हमें थोड़ा देर से याद आया।”

रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और मुसाफ़िरखानों में भी बारीकी से चेकिंग हुई।

देर रात घूमने वालों से पूछताछ ऐसे की गई जैसे मोहल्ले का कोई चौकीदार अचानक जिम्मेदार हो जाए और हर आने जाने वाले से पूछे कौन हो? क्यों हो?

वैसे 

पुलिस कह रही है कि यह कार्रवाई ‘लगातार प्रयासों’ का नतीजा है।

अब ये ‘लगातार’ कितना लगातार है, ये समझना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि मुजरिम तो सालों से लगातार भाग ही रहे थे।

असल बात यह है कि हमारे यहाँ क़ानून भी इंसान की तरह है 

कभी बहुत मेहनती हो जाता है,

और कभी इतना आरामतलब कि मुजरिम भी चैन से सो जाए।

मगर इस बार क़ानून ने करवट ली है।

और जब क़ानून करवट लेता है

तो 222 लोग अचानक याद आ जाते हैं।

वैसे इस बात को भी नही झूठलाया जा सकता की जबलपुर की मैदानी पुलिसींग राज्य के अन्य जिलों से बहतर है