काग़ज़ी क़ानून, फरार मुल्ज़िम और बेबस शहर: जबलपुर में जुर्म की फ़ाइलें भारी, इंसाफ़ हल्का!
Anam Ibrahim
Journalist 007
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पुलिस कंट्रोल रूम में दोपहर दो बजे की बैठक में क़ानून की मोटी किताबें खुलीं, फ़ाइलों का बोझ तौला गया और जुर्म की लिस्ट फिर से गिनाई गई। पुलिस अधीक्षक जबलपुर सम्पत उपाध्याय की अपराध समीक्षा बैठक, सुनने में सख़्त, देखने में रूटीन और ज़मीनी हक़ीक़त में सवालों से घिरी नज़र आई।
हत्या, हत्या के प्रयास, लूट, झपटमारी, नक़बज़नी, महिला अपराध, एससी-एसटी एक्ट जुर्म की ये फ़ेहरिस्त किसी मंटो की कहानी नहीं, बल्कि जबलपुर की सरकारी फाइलों का आईना है। बैठक में हर थाने के लंबित गम्भीर अपराधों की समीक्षा हुई,
मगर सवाल वही पुराना अगर समीक्षा ही इलाज है, तो सालों से फरार मुल्ज़िम अब तक हवा क्यों हैं?
ऑपरेशन मुस्कान के तहत अपहृत नाबालिगों की दस्तयाबी के निर्देश दोहराए गए। काग़ज़ पर हर संभव प्रयास ज़मीन पर इंतज़ार। अम्मा अगर होती तो शायद पूछती जब बच्चे ग़ायब हों और फ़ाइलें बाक़ी रहें, तो सत्य की जीत कैसे मानी जाए?
सीएम हेल्पलाइन, जनसुनवाई और वरिष्ठ कार्यालयों की शिकायतों को प्राथमिकता देने का हुक्म भी जारी हुआ। अब ग़ालिब की याद आती है
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
यहाँ ख़्वाहिश नहीं, शिकायतें दम तोड़ रही हैं।
महिला अपराधों में संवेदनशीलता, त्वरित गिरफ़्तारी और चालान की बात फिर दोहराई गई। सवाल यह नहीं कि निर्देश दिए गए या नहीं, सवाल यह है कि महिलाओं के लिए डर की तारीख़ कब खत्म होगी? ख़ुसरो की ज़बान में कहें तो नैना मिलाइके भरोसा कब बनेगा?
स्थायी वारंट, इनामी फरार आरोपी, जिले से बाहर छिपे अपराधी सब पर सख़्ती के एलान हुए। आदतन अपराधियों पर बाउंड ओवर, बी.एन.एस.एस. की धाराएँ, 141 की चेतावनी क़ानून का पूरा शब्दकोश मौजूद है, पर यहां मैरे दोस्त हासिम की तंज़ीली हँसी याद आती है: जब नियमों की भरमार हो और अमल की कमी, तो जुर्म बेख़ौफ़ रहता ही है।
सीसीटीवी कैमरों की दुहाई फिर दी गई संवेदनशील इलाक़ों में ज़्यादा कैमरे, ज़्यादा निगरानी। मगर शहर पूछ रहा है: कैमरे लगेंगे या कैमरों की फ़ाइलें?
बैठक में त्रिवार्षिक तुलनात्मक समीक्षा, लंबित मर्ग, गुमइंसान, चोरी गई संपत्ति की बरामदगी और आउटर पॉइंट्स पर वाहन चेकिंग के निर्देश भी गूँजे। सब कुछ कहा गया, सब कुछ लिखा गया बस वही पुरानी कमी: नतीजे।
यह खबर इसलिए नकारात्मक है क्योंकि जुर्म नकारात्मक है। जब हर महीने वही समीक्षा, वही फरार नाम और वही आश्वासन हों, तो शहर की उम्मीदें भी रिमांड पर चली जाती हैं।
जबलपुर को हुक्म नहीं, हिम्मत चाहिए; निर्देश नहीं, इंसाफ़ चाहिए वरना अगली बैठक में जुर्म की सूची और लंबी, और भरोसे की फ़ाइल और पतली होगी।
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