सलाखों के पीछे टूटते ज़ेहनों के लिए MP जेलों में अब ‘मरहम’ RRU से MOU, भोपाल में खुलेगा पहला साइको सोशल काउंसलिंग सेंटर!
सलाखों के पीछे टूटते ज़ेहनों के लिए MP जेलों में अब ‘मरहम’ RRU से MOU, भोपाल में खुलेगा पहला साइको सोशल काउंसलिंग सेंटर!
Anam Ibrahim
Journalist-007
7771851163
मप्र के कैदखानों की सलाखों के पीछे कोई चीख़ रहा है,और बाहर की दुनिया बहरी गूंगी ख़ामोश है!
सज़ा मिल गई, मगर टूटे हुए ज़ेहन का क्या? MP की जेलों में अब कैदियों के जिस्म नहीं, उनके ज़ख़्म तलाशे जाएंगे भोपाल से शुरू होगी साइको-सोशल काउंसलिंग की पहली मुहिम; सवाल सिर्फ़ कैदी के सुधार का नहीं, इंसान को बचा लेने का है
BBC-OF-INDIA
न्यूज़ नेटवर्क
BHOPAL/MP: जी हां सज़ा के साथ सुधार की राह राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय तैयार करेगा अब जेलों के मास्टर ट्रेनर, प्रदेशभर में मानसिक रूप से बीमार व तनावग्रस्त बंदियों की पहचान, काउंसलिंग और पुनर्वास का बनेगा संस्थागत तंत्र बहरहाल
बता दें की जेल की सलाखें जिस्म को कैद कर सकती हैं, मगर टूटे हुए ज़ेहन को नहीं। किसी बैरक में बैठा बंदी बाहर से ख़ामोश हो सकता है, लेकिन उसके भीतर चल रहा तनाव, अकेलापन, पछतावा और मानसिक संघर्ष अक्सर किसी पहरेदार की नज़र में नहीं आता। खैर अब मध्यप्रदेश जेल विभाग ने इसी अनदेखे दर्द को पहचानने और उसका इलाज़ संवाद व काउंसलिंग के ज़रिये करने की पहल की है।
जेल महानिदेशक डॉ. वरुण कपूर की विशेष पहल एवं मार्गदर्शन में मध्यप्रदेश जेल विभाग और राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय (RRU), गांधीनगर, गुजरात के बीच साइको-सोशल काउंसलिंग के लिए MOU किया गया है। इसका उद्देश्य मानसिक रूप से बीमार एवं तनावग्रस्त बंदियों की पहचान, काउंसलिंग और मानसिक सुधार के लिए जेलों में एक सुदृढ़ एवं स्थायी तंत्र विकसित करना है।
जेल मुख्यालय, भोपाल में आयोजित MOU कार्यक्रम में विशेष महानिदेशक जी. अखेतो सेमा, उप महानिरीक्षक (कल्याण) एम.आर. पटेल तथा RRU की एक्टिंग डायरेक्टर डॉ. नूरिन चौधरी, प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. गीतेश कुमार सिंह, असिस्टेंट डायरेक्टर प्रदीप रूसिया, तनु पी. चंदेल, शुभम जैन सहित जेल विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।
इस पहल की बुनियाद 6 से 12 जुलाई तक भोपाल में आयोजित सात दिवसीय विशेष प्रशिक्षण से पड़ी थी। RRU के विशेषज्ञों ने प्रदेश की विभिन्न जेलों के 28 अधिकारी-कर्मचारियों मेलनर्स, फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन, मुख्य प्रहरी और प्रहरी को तनावग्रस्त बंदियों की पहचान एवं साइको-सोशल काउंसलिंग का प्रशिक्षण दिया।
प्रशिक्षण के बाद इन कर्मचारियों ने संबंधित जेलों में जाकर बंदियों की काउंसलिंग की। प्राप्त फीडबैक और परिणामों की समीक्षा में मानसिक सुधार की दिशा में सकारात्मक परिणाम सामने आए। इसके बाद इस व्यवस्था को महज़ एक प्रयोग न रहने देकर संस्थागत रूप देने के लिए RRU के साथ MOU की राह तैयार हुई।
अब एक काउंसलर नहीं, तैयार होंगे मास्टर ट्रेनरों के ज़रिये पूरी व्यवस्था!
MOU के तहत जेल विभाग के चयनित अधिकारी-कर्मचारियों को राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, गांधीनगर भेजकर मास्टर ट्रेनर कोर्स कराया जाएगा। प्रशिक्षण के बाद यही अधिकारी-कर्मचारी प्रदेश की जेलों में दूसरे अधिकारियों-कर्मचारियों को साइको-सोशल काउंसलिंग का प्रशिक्षण देंगे।
यानी कोशिश सिर्फ़ कुछ बंदियों की काउंसलिंग तक सीमित नहीं, बल्कि ऐसा प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करने की है जो जेलों में तनावग्रस्त बंदियों की हालत को समय रहते पहचान सके और उन्हें आवश्यक मनो-सामाजिक सहयोग उपलब्ध करा सके।
भोपाल से उठेगी पहली आवाज़
इस KAAR-E-KHAIR कार्ययोजना के पहले चरण में केन्द्रीय जेल भोपाल में जेल विभाग का पहला साइको-सोशल काउंसलिंग सेंटर स्थापित किया जाएगा। इसके अनुभव और परिणामों के आधार पर प्रदेश की अन्य जेलों में भी इसे चरणबद्ध रूप से लागू किया जाएगा।
यह पहल एक बुनियादी सवाल भी सामने रखती है जब अदालत सज़ा तय कर चुकी है, तो क्या सुधार की जिम्मेदारी वहीं खत्म हो जाती है?
जेल का दरवाज़ा एक दिन खुलेगा और बंदी समाज में लौटेगा। उस दिन असली परीक्षा यह होगी कि वह अपने भीतर कितना गुस्सा, कितना तनाव और कितनी टूटन लेकर बाहर आया है।
मध्यप्रदेश जेल विभाग का यह प्रयोग इसी सच को स्वीकार करने की कोशिश है कि सुधार सिर्फ़ सलाखों से नहीं होता कभी-कभी एक प्रशिक्षित कान, एक संवेदनशील संवाद और समय पर मिला सहारा भी किसी इंसान को पूरी तरह टूटने से बचा सकता है।
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