इंदौर के डायल-112 हीरोज: दो नन्हें कदम, सड़कों पर भटका बचपन: खाकी ने थामा मासूमियत का हाथ!

इंदौर के डायल-112 हीरोज: दो नन्हें कदम, सड़कों पर भटका बचपन: खाकी ने थामा मासूमियत का हाथ!

Anam Ibrahim 

Journalist007

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बच्चियाँ सहमी हुई थीं। यूनिफॉर्म साफ थी, इरादे साफ़ थे ग़लती सिर्फ इतनी कि बचपन को दुनिया की चालाकी नहीं आती।

       *BBC-OF-INDIA* 

            न्यूज़ नेटवर्क 

             PHQ Bhopal/Mp 

दोस्तों कभी कभी खबर नहीं लिखी जाती सीने पर रखी जाती है। और आज की दास्तान वही है दो नन्हीं जानें, एक बेपरवाह शहर, और वक्त पर पहुँची खाकी।

भोपाल, 24 फरवरी 2026।

पुलिस मुख्यालय, मध्यप्रदेश के जनसंपर्क कक्ष से निकली एक सीधी सादी प्रेसनोट लेकिन जनाब, हर काग़ज़ पर छपी खबर स्याही से नहीं, कभी-कभी ज़मीर से भी लिखी जाती है। और आज की यह खबर, इंदौर की धूल भरी सड़कों से उठकर इंसानियत की पेशानी पर आ टिकती है।

मामला है इंदौर के थाना एरोड्रम इलाके का। सेंट्रल वेयर हाउस के सामने दो नन्हीं बालिकाएँ स्कूल की यूनिफॉर्म में, कंधे पर मासूमियत का बस्ता, आँखों में रास्ता पूछती खामोशी। घर से निकली थीं स्कूल को, मगर शहर की बेपरवाह रफ्तार ने उन्हें मोड़ पर छोड़ दिया।

सूचना पहुँची मध्यप्रदेश पुलिस के राज्य स्तरीय पुलिस कंट्रोल रूम, भोपाल फिर क़्या था डायल-112 की घंटी बजी और यह कोई मोबाइल की रिंगटोन नहीं थी, यह समाज की आत्मा की घंटी थी।

थाना एरोड्रम में तैनात डायल-112 एफआरव्ही वाहन बिना वक़्त गवाएं मौके को रवाना हुआ। सउनि कैलाश मेडा, आरक्षक पुष्पेंद्र शर्मा और पायलट अजय प्रजापति तीन वर्दियाँ, मगर उस वक़्त सिर्फ वर्दी नहीं, तीन धड़कते दिल कहें तो अच्छा है ।

बालिकाएँ सहमी थीं, मगर टूटी नहीं थीं। शायद उन्हें मालूम था कि हर सायरन डर का नाम नहीं होता। जवानों ने उन्हें अपने संरक्षण में लिया। स्कूल की यूनिफॉर्म बहुत कुछ कह रही थी घर से निकली थीं पढ़ने, मगर शहर ने उन्हें सबक पहले ही दे दिया।

सूझबूझ से संबंधित स्कूल से संपर्क किया गया। काग़ज़ी प्रक्रिया से ज्यादा अहम था भरोसे का काग़ज़ जो माँ बाप की आँखों में लिखा था। जानकारी मिली, परिजन चौकी पहुँचे। पहचान, सत्यापन और फिर वह लम्हा जब माँ की गोद ने पुलिस चौकी को मंदिर बना दिया।

दरअसल माँ बच्चियों को तैयार कर बैग और टिफिन लेने भीतर गई थीं। उधर खेल खेल में दो मासूम कदम गली से सड़क और सड़क से भटकाव तक पहुँच गए। शहर बड़ा है साहब, और बचपन बहुत छोटा।

परिवार ने राहत की साँस ली, डायल-112 जवानों का शुक्रिया अदा किया। मगर सवाल हवा में अब भी तैरता है क्या हर बार किस्मत इतनी मेहरबान होगी?

डायल 112 सिर्फ एक नंबर नहीं, यह भरोसे का बटन है। मगर भरोसा सिर्फ पुलिस पर क्यों? समाज की चौकसी, पड़ोस की निगाह, माँ-बाप की सतर्कता इन सबका डायल कौन दबाएगा?

यह घटना एक मिसाल है कि वर्दी जब इंसानियत से भीगती है तो खाकी रंग कम और करुणा ज्यादा दिखती है।

इंदौर के इन डायल 112 हीरोज़ ने साबित किया कि पुलिस सिर्फ कानून की रखवाली नहीं करती, कभी कभी बचपन की हिफाज़त भी करती है।

अम्मा उस्तादन अगर हयात होती ती तो शायद कहती समाज कब जागेगा?

ये शहर गुनहगार नहीं, लापरवाह है।

वतन-ए-हिन्द के अब्बा हुज़ूर ज़नाब हज़रत गाँधी जी होते तो कहते सबसे आख़िरी बच्चे की सुरक्षा ही असली आज़ादी है।

और हम?

हम यह लिख रहे हैं कि दो बच्चियाँ घर लौट आईं। मगर असली खबर यह है कि आज इंसानियत भी थोड़ी देर के लिए घर लौट आई।

मगर खबर का असली निचोड़ तो यह है की 

बचपन काँच की तरह है, एक चूक और किरचें बिखर जाती हैं।

अपने ज़िगर के टुकड़ो अपनी औलादो की हिफाजत करो क्योंकि मासूमियत की पहली तालीम की दर्शगाह माँ बाप की निगेहबानी है उनकी पनह उनकी सरपरसती उनकी देखभाल उनका फ़र्ज़ ही तो है और जिन माँ बाप ने अपना फ़र्ज़ नही निभाया उनका रिश्तो पर कोई है नही