सीएम हेल्पलाइन: शिकायतों का “सशक्त निराकरण” या सिर्फ़ दिखावा?
Anam Ibrahim
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BBC OF INDIA. COM
नेशनल न्यूज़ नेटवर्क
- मुकेश सिंह
- ज़फीर खान
- पंकज अतुलकर
- फराज़ खान
*इंदौर/मप्र:* इंदौर में सीएम हेल्पलाइन के विशेष शिविर का नाटक हुआ, जहां पुलिस और प्रशासन के अधिकारी शिकायतों को सुनने और “हाथों-हाथ” निपटाने पहुंचे। शिविर में कुल 261 फरियादी पहुंचे, जिनमें से 63 को "संतुष्ट" कर तसल्ली के साथ घर भेज दिया गया। पर सवाल ये है बचे हुए पीड़ित बाकियों का क्या हुआ?
*शिविर की हकीकत:*
शिविर में आए फरियादी शायद इस उम्मीद से पहुंचे थे कि इस बार तो भगवान से पहले पुलिस उनकी सुन लेगी। परंतु, "हाथों-हाथ" शिकायतों का निपटारा सुनने में जितना आसान लगता है, हकीकत में उतना ही मुश्किल।
700 दिनों की शिकायतें सुलझाई गईं, यानी दो साल से लटकी फाइलें अचानक जादू की छड़ी से हल हो गईं!
500 दिनों की शिकायतें निपटाने पर अधिकारियों ने खुद को पीठ थपथपा ली।
लेकिन 261 में से सिर्फ़ 63 शिकायतें निपटाना कैसा त्वरित न्याय है, हुजूर? बाकी के 198 फरियादी तो शिविर से निकले वैसे ही जैसे गांव की बारात बिना दुल्हन के लौटती है!
*अधिकारियों का दावा:*
पुलिस अधिकारी बड़े गर्व से कहते हैं कि “शिकायतकर्ता हमारी कार्यवाही से बहुत प्रसन्न हुए और संतुष्टि व्यक्त की।”
पर क्या असलियत में ये संतुष्टि थी या हार मानकर चुप्पी साधने वाली मजबूरी? "ओए सरदार जी, फेर एही गल है—गरीब और निर्दोष फरियादी हो या पंडित, सबनु इक दिन एना ही सन्नाटा मिलदा है।"
*व्यंग्यपूर्ण सवाल:*
700 दिनों तक शिकायत क्यों पड़ी रही? क्या हेल्पलाइन भी 'स्पीड पोस्ट' पर चल रही है?
261 में से केवल 63 शिकायतें निपटाने का मतलब 75% लोग वापस मायूस गए। ओ पंजाबियों दी गल करिये तां ए, साडा सिस्टम वी किन्ना स्लो है, जा पुत्तर लस्सी पी ले तांही हल चाल होगी।
"हाथों-हाथ" का मतलब क्या कागज़ पर दस्तखत करना है या असली समाधान देना?
*मजेदार पहलू:*
इस शिविर में सबसे ज्यादा ताज्जुब तो ये है कि हेल्पलाइन की 50 दिनों की नई शिकायतें भी सुलझा दी गईं, लेकिन 2-3 साल पुराने मामलों का आज तक कोई गौर फरमाने वाला अधिकारी नहीं मिला।
*निष्कर्ष:*
इस पूरी कवायद का सार यही है कि सीएम हेल्पलाइन की समस्या समाधान की गाड़ी “दिखावे” के ईंधन पर चल रही है। फरियादी बस यही सोचकर लौटते हैं कि "पता नहीं अपनी समस्या हल करवाने के लिए कौन सा ग्रह नक्षत्र ठीक करवाना होगा।"
अंत में यही कहना है:
"अरे वाह, हेल्पलाइन वाले!
फाइलें सुलझाने में लगा दिया साल,
आम जनता कह रही, चाय पियो लाल।"
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