मुख्यमंत्री जन कल्याण पर्व" पर सरकारी तमाशा, जनता गायब, अफसरों की हाजिरी पूरी!

मुख्यमंत्री जन कल्याण पर्व" पर सरकारी तमाशा, जनता गायब, अफसरों की हाजिरी पूरी!

Anam Ibrahim 

7771851163

*BBC OF INDIA. COM*

Mukesh singh 

Pankaj atulkar 

*जबलपुर/मप्र:* जबलपुर के कर्पोरेशन चौक पर आज का दिन कुछ यूं बिता, मानो सरकारी फरमान की तामील में सब कुछ रंग-बिरंगा दिखाना था। "मुख्यमंत्री जन कल्याण पर्व एवं विजय दिवस" के नाम पर पुलिस के आला अधिकारियों और 6वीं वाहिनी वि.स.बल के बैण्ड दल ने राष्ट्रभक्ति गीतों की धुनें बजाईं। लेकिन ये नायाब नजारा देखने के लिए सिर्फ सरकारी अफसरों और पुलिसकर्मियों की फौज जुटी थी। आम जनता, जिसे इस 'कल्याण पर्व' का हिस्सा बनना चाहिए था, शायद घर पर आराम फरमा रही थी या महंगाई से जूझ रही थी।

मुख्यमंत्री के निर्देश पर आयोजित इस आयोजन में पुलिस महानिरीक्षक अनिल सिंह कुशवाह, उप महानिरीक्षक अतुल सिंह और पुलिस अधीक्षक सम्पत उपाध्याय अपनी उपस्थिति से मंच की शोभा बढ़ा रहे थे। लेकिन "मुख्यमंत्री का कल्याण पर्व" लगता है सिर्फ फाइलों में चमक रहा था, क्योंकि आयोजन स्थल जनता के लिए वैसा ही खाली था जैसे रसोई में पड़ी खाली थाली।

*हुकूमत की मंशा या दिखावा?*

इस पूरे तमाशे में नज़र आया कि पूरा सरकारी तंत्र सजावट और तस्वीरें खिंचवाने में मशगूल था। अफसरों की कतार और बैण्ड की धुनें तो ज़ोरों पर थीं, लेकिन हज़रत, वो 'जनता' नाम की चीज़ कहीं नदारद थी। क्या ये 'कल्याण पर्व' सरकारी मखमली फाइलों और लाल फीते का ग़ुलाम बन चुका है?

*अल्फाज़ों की बाज़ीगरी या असल कल्याण?*

इस पूरे कार्यक्रम का असल मकसद क्या था, ये समझना मुश्किल है। क्या बैण्ड की धुनें सुनकर जनता का 'कल्याण' हो गया, या ये महज़ सरकारी शोशेबाज़ी थी? अगर यही 'विजय दिवस' का जश्न है, तो फिर असली जश्न तो सिर्फ अफसरों के दिलों में था।

आखिरकार, ऐसा लगा जैसे ये आयोजन जनता की नहीं, बल्कि सरकारी कुर्सियों की जीत का ऐलान था।