हनुमानगंज पुलिस 12 लाख के 50 मोबाइल बरामद: DCP जोन-3 ने अपने हाथों से फरियादियों को लौटाए।

हनुमानगंज पुलिस 12 लाख के 50 मोबाइल बरामद: DCP जोन-3 ने अपने हाथों से फरियादियों को लौटाए।

हनुमानगंज पुलिस 12 लाख के 50 मोबाइल बरामद: DCP जोन-3 ने अपने हाथों से फरियादियों को लौटाए।

Anam Ibrahim 

Journalist_007

Input by....

Moin Khan Journalist 

हनुमानगंज पुलिस 12 लाख के 50 मोबाइल बरामद: DCP जोन-3 ने अपने हाथों से फरियादियों को लौटाए।

थानों में दर्ज थीं गुमशुदगियाँ मगर मोबाइल किसी और की ज़िंदगी जी रहे थे!

CEIR की मदद से 50 मोबाइल बरामद, मगर समाज अब भी अपनी खोती सतर्कता से बेखबर!!

*हनुमानगंज थाने ने CEIR से 50 मोबाइल बरामद कर लिये मगर यह खबर सिर्फ मोबाइल मिलने की नहीं, उस समाज की चार्जशीट है जहाँ आदमी की याद, रोटी, मोहब्बत और पहचान अब एक स्क्रीन में कैद होकर जेबकतरों के रहमोकरम पर जी रही है!*

   

  

Bhopal/Mp: भोपाल की सड़कों पर इन दिनों सिर्फ ट्रैफिक नहीं भाग रहा

भाग रही है इंसान की अक्ल, उसकी तमीज़, उसका सुकून और उसकी जेब में रखा वह मोबाइल, जिसे उसने अब अपने दिल से भी ज्यादा अज़ीज़ बना लिया है।

जिस मोबाइल ने उसे बेचैन किया, नींद छीनी, रिश्ते तबाह किये उसी मोबाइल के गुम होते ही वह थाने की चौखट चूमने पहुँच जाता है।

हनुमानगंज थाने में पिछले दिनों ऐसे ही पचास लोग पहुँचे थे।

किसी की आँख में घबराहट थी, किसी की आवाज़ में टूटन।

कोई कह रहा था 

“साहब बैंक चल जाएगा”

कोई फुसफुसाया 

साहब बच्चियों की फोटो थीं

और कोई सिर्फ चुप था।

क्योंकि कुछ गुमशुदगियाँ ऐसी होती हैं जिनका बयान आदमी की ज़बान नहीं कर पाती।

यह बारह लाख के मोबाइलों की खबर नहीं है जनाब

यह उस मुल्क की खबर है जहाँ गरीब आदमी अपना खून बेचकर फोन खरीदता है ताकि दुनिया उसे “अपडेटेड” समझे।

जहाँ बाप की दवाई रुक सकती है मगर बच्चे का रिचार्ज नहीं रुकता।

जहाँ मोहल्ले में आदमी की इज़्ज़त उसके किरदार से नहीं, कैमरे के मेगापिक्सल से नापी जाती है।

और फिर हम कहते हैं 

समाज बदल रहा है।

नहीं साहब

समाज बदल नहीं रहा।

समाज धीरे-धीरे अपनी रूह गिरवी रख रहा है।

पुलिस कमिश्नर संजय कुमार और अतिरिक्त पुलिस आयुक्त शैलेन्द्र सिंह चौहान के निर्देश पर डीसीपी आयुष गुप्ता, अतिरिक्त डीसीपी दीपक नायक और एसीपी राकेश सिंह बघेल की निगरानी में थाना प्रभारी अवधेश सिंह भदौरिया और उनकी टीम ने CEIR पोर्टल के सहारे उन गुम मोबाइलों को तलाशना शुरू किया।

CDR निकाली गईं।

CAF रिपोर्टें खंगाली गईं।

डिजिटल गलियों में पीछा किया गया।

और आख़िरकार पचास मोबाइल बरामद हो गये।

यह पुलिस की कामयाबी है और होनी भी चाहिए।

क्योंकि इस देश में उम्मीद अगर पूरी तरह मर जाए तो संविधान सिर्फ किताब रह जाएगा।

मगर इस खबर के पीछे एक ऐसा सवाल खड़ा है जिसे अपने अफ़सानों में चीखकर पूछना लाज़मी है 

कि आखिर हम किस दौर में जी रहे हैं?

वह दौर

जहाँ आदमी अपने बच्चे का बचपन नहीं बचा पा रहा मगर क्लाउड बैकअप बचा रहा है।

जहाँ रिश्ते “टाइपिंग” पर टिके हैं।

जहाँ प्रेम “ऑनलाइन” दिखता है और इंसानियत “लास्ट सीन” होकर गायब हो चुकी है।

गाँधी शायद आज होते तो चरखा छोड़ मोबाइल की स्क्रीन पर उँगली फेरते इस मुल्क से पूछते 

“तुम्हारी तरक्की ने तुम्हें इंसान कितना छोड़ा है?”

और इक़बाल शायद यह देखकर फिर लिखते 

“ख़ुदी को कर बुलंद इतना”

मगर आज की खुदी इतनी सस्ती हो चुकी है कि OTP आते ही किसी लिंक पर क्लिक कर देती है।

इस पूरी कार्रवाई में प्रआर सुनील दुबे, रामकृपाल मीणा, भूपेन्द्र औझा, विजेन्द्र माकोडे, आशीष वर्मा, रोशन प्रजापति और मोहन पटेल की भूमिका सराहनीय रही।

इन पुलिसवालों ने पचास मोबाइल बरामद किये हैं

काश, कभी यह समाज अपनी गुम होती शर्म, सच्चाई और इंसानियत भी इसी तत्परता से तलाशने लगे।

CEIR की मदद से 50 मोबाइल बरामद, मगर शहर अब भी अपनी खोती सतर्कता से बेखबर।