इंदौर रंगून गार्डन की रात: ‘MD’ और दो साये शहर सोता रहा, नशा चढ़ता रहा!
इंदौर रंगून गार्डन की रात: ‘MD’ और दो साये शहर सोता रहा, नशा चढ़ता रहा!
Anam Ibrahim
Journalist_007
7771851163
Ps खज़राना....
झाड़ू की तीलियों और रिक्शे के पहियों के बीच पलता धंधा दो गिरफ्तार, मगर खौफ़ ये कि असली चेहरा अब भी अंधेरे में मुस्कुरा रहा है
BBC_OF_INDIA
Indore/Mp:
इंदौर धंदेबाज़ों के इस नामुराद नकचढ़े शहर की शरारती शाम यूँ तो खामोश लगती हैं, लेकिन कुछ खामोशियाँ चीखती हैं बस सुनने वाले कान चाहिए। बहरहाल मामला कुछ यूं गुज़रा थाना खजराना ईलाके मे मौज़ूद रंगून गार्डन के पास वही रात थी हवा ठहरी हुई, जैसे किसी ने वक्त का गला दबा दिया हो।
दो आदमी एक स्कूटी पर बैठे थे
एक इरफ़ान उर्फ हामा और दूसरा गोकुल। नाम मामूली, किस्सा ख़तरनाक। एक झाड़ू बनाता था गंदगी साफ करने के लिए। दूसरा रिक्शा चलाता था लोगों को मंज़िल तक पहुँचाने के लिए। मगर उस रात दोनों खुद गंदगी बन चुके थे और मंज़िल? सीधी जेल की सलाखें।
चुनाँचे पुलिस की गाड़ी की हेडलाइट जैसे ही उन के चेहरों पर पड़ी, उनकी आँखों में वही डर तैर गया जो अक्सर गुनाह के बाद पैदा होता है। भागे ऐसे जैसे साया अपने जिस्म से भागे। मगर साये कभी बचते नहीं। घेराबंदी हुई, हाथ पकड़े गए, और जब जेबें टटोली गईं तो निकला ‘MD’। नशे का सफेद जहर। 10 ग्राम से ज्यादा। कीमत..एक लाख।
एक लाख......
यानी कुछ रातों की नींद बेचकर कमाई गई मौत।
उनके पास खड़ा था एक ऑटो रिक्शा तीन लाख का। वही रिक्शा जो दिन में रोटी कमाता था, रात में जहर ढोता था। कुल हिसाब
चार लाख का मशरुका । मगर असली घाटा? वो जो शहर हर रोज़ अपनी नसों में महसूस करता है।
पूछताछ में उन्होंने कबूल किया
नशे के आदी हैं और जल्दी अमीर बनने का ख्वाब देखते थे।
ख्वाब... जो अक्सर कब्र की तरफ ले जाते हैं।
NDPS एक्ट की धाराएँ लग गईं, केस दर्ज हो गया, रिमांड पर पूछताछ जारी है। कागज़ों में सब कुछ मुकम्मल लगेगा जैसे इंसाफ हो गया हो।
मगर जनाब
कहानियाँ यहाँ खत्म नहीं होतीं, यहीं से शुरू होती हैं।
क्योंकि ये दोनों सिर्फ चेहरे हैं
असल चेहरा नहीं।
ये वो पत्ते हैं जो टूटकर गिर गए मगर दरख़्त अब भी खड़ा है, नशे का गहरा, साया फैलाए, जड़ों में छुपा हुआ।
और सवाल वो अब भी जिंदा है, ठंडा और खौफ़नाक
क्या खजराना की इस रात में सच में सिर्फ दो ही गुनहगार थे? या कोई तीसरा साया भी था जो अंधेरे के पीछे खड़ा ये तमाशा देख रहा था, और अब भी देख रहा है?
क्योंकि सच ये है
शहर में नशा बिकता नहीं
शहर को धीरे-धीरे नशा बना दिया जाता है।
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